Friday, February 10, 2012

हम स्कूल में इंसान बना रहे है या जानवर?

 हमारे समाज में अपराधों की फेहरिस्त लगातार लंबी हो रही है.अगर हम इस का कारण जानने की कोशिश  करेंगे तो आम तौर पर  बेरोजगारी,अशिक्षा , गरीबी,पिछड़ापन इस के मुख्य कारण नज़र आते हैं.परन्तु आज के समय में इन कारणों से हटकर भी कुछ अन्य कारण है जिसने हमारे समाज कि नीव को हिला दिया है और हमारे लिए एक समस्या का रूप ले चुके है.देश में किसी भी अपराध की  अधिकतम सज़ा उम्र क़ैद और फांसी निर्धारित है पर मैं जिन अपराधों के बारे में बात कर रही हूँ वो बच्चों से जुडे है और इन अपराधों की जगह स्कूल बन गए हैं....आज हम  स्कूल के छात्रों द्वारा अपने ही सहपाठी का क़त्ल करना ,अपने शिक्षकों के साथ अभद्रता,अपने शिक्षक का क़त्ल,छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे से दुश्मनों जैसा बर्ताव करना आदि स्थितियां देख रहे है.आज सबसे ज्यादा स्कूलों में अपराध का ग्राफ ऊपर की ओर बढ़ रहा है.जिस स्थान को हम विद्या का मंदिर कहते है.वहाँ पर ज्ञान प्राप्ति के साथ आज हमारी नयी पीढ़ी आपराधिक गुण भी सीख रही है. क्या यह सही है?
                         आज हम स्कूल में बच्चों को सिगरेट ,शराब की लत ,अपने दोस्तों के 'एमएमएस' बनाते  देख रहे है. एक नामी स्कूल की घटना आजकल चैनलों की सुर्खी बनी हुई है. जिसमें एक नवमी कक्षा के छात्र ने अपनी शिक्षिका का क़त्ल कर दिया, क्योंकि उसकी शिक्षिका ने उसके माता-पिता को उसकी गलतियों से अवगत करने के लिए नोट घर भेज दिया था. इस बात से परेशान छात्र ने कक्षा में शिक्षिका को अकेला पाकर उसे चाकू से गोदकर मार डाला. इसी तरह के कुछ अपराध लगातार मीडिया में दिख रहे है. क्या हम इन के पीछे का सच जानने का प्रयास नहीं करना चाहिए? मेरे विचार में कुछ ऐसे  कारण है जो इन समस्याओं का मूल है मसलन एकल परिवार , कंप्यूटर, लैबटॉप,पामटॉप का बढ़ता चलन, इन्टरनेट का आसान प्रयोग, इन्टरनेट का मोबाईल पर उपलब्ध होना, टीवी  में आ रहे कार्यक्रम,मातापिता का वर्किंग होना, संयुक्त परिवार का विघटन.  आजकल के  एकल परिवारों में बच्चों के लिए माँ-बाप के पास समय नहीं होता इसलिए बच्चों को टीवी और कंप्यूटर के साथ वक्त बिताना पड़ता है. अब इनमे वो क्या देख रहे है और उनसे क्या सीख रहे है यह जान पाने की फुर्सतमाँ-बाप  को नहीं है.शायद यही से वे वो सब कुछ सीख रहे है जिसने उनके धैर्य, सहनशीलता, अपनत्व,मित्रता की भावना को धीरे धीरे खत्म कर  दिया है.यहाँ यह सोचने वाली बात है कि क्या हम इन स्कूलों में बढ़ रहे अपराधों को कम कर सकते है? इस के लिए हम कुछ कदम उठाने होगे जिनमे संयुक्त परिवारों का महत्व बढ़ाना, बच्चों को कंप्यूटर के प्रयोग की सीमा निर्धारित की जाये, समय सीमा भी निर्धारित की जाये, इन्टरनेट का प्रयोग भी आवश्यकता अनुसार ही हो.माँ बाप वर्किंग टाइम के साथ साथ बच्चों को भी समय दे, उनकी पढ़ाई और अन्य गतिविधियों पर भी नज़र रखें, पेरेंट्स मीटिंग में स्कूल पहुंचकर शिक्षकों से मिलकर पूरी जानकारी ले .बच्चों को नाना- नानी, दादा- दादी के साथ मित्रवत सम्बन्ध बनाने के लिए प्रेरित करें ताकि वे कभी भी खुद को अकेला ना महसूस करें. आपने मित्रों के प्रति प्रतिस्पर्धा की भावना ना होकर मित्रतापूर्ण बर्ताव ही हो अगर हम यह छोटे छोटे कदम उठाएंगे तो  बच्चों को वो सुरक्षित, खुशहाल, शांत वातावरण दे पाएंगे और  हमारे बच्चों में नयी उमंग और उत्साह के साथ छात्र जीवन को आगे बढ़ा सकेंगे.और अपने सुनहरे भविष्य की नयी इबारत लिखेंगे ................                                                                                                                                                                                                                                                                                                 

Thursday, October 20, 2011

सौंदर्य प्रसाधन या रंगभेद बढ़ाने के नए हथियार

 हमारे समाज में स्त्रियों को अपना सम्मान बनाये  रखने के लिए हमेशा ही अत्यधिक प्रयासरत रहना पड़ता है क्योंकि उन्हें इस के लिए अनेक मापदंडों की कसौटी पर परखा जाता है.आज समाज में भलेहि नारी को पुरुषों के बराबर हक़ मिलने की बात चल रही है लेकिन इसके बाद भी नारी को तो परीक्षा देना ही पड़ रहा है.इन मापदंडों में योग्यता के साथ कई और ऐसे बिंदु भी हैं जो किसी के भी व्यक्तित्व का मूल्यांकन कर उसके बारे में पुरुषों को राय बनाने का अवसर देते हैं.पर क्या इस मापदंड का आधार सुंदरता से जोड़ना सही है?  यह तो हम सभी जानते है कि सुंदरता का सम्बन्ध रंगरूप से भी है तभी तो   गोरे होने से मार्केट डिमांड से लेकर नौकरी मिलने में भी आसानी हो जाती है. तमाम देशी-विदेश कंपनियों ने विज्ञापन जगत कि मदद से गोरेपन की क्रीम और मोटापा कम करने की दवाइयों को लाकर महिलाओं को दिग्भ्रमित कर दिया है.फेयरनेस क्रीम के बाद अब बारी है गोरा करने वाले फेसवाश की, पिम्पल दूर करने क्रीम , पिगमेंट(दाग-धब्बे) हटानेवाली क्रीम की जो त्वचा के रंग को हल्का करने का दावा करती हैं.इन 'प्रोडक्ट' की दीवानगी इन दिनों सर चढ़कर बोल रही है.उत्पादक इन्हें बेचने के लिए अनोखे तरीके अपनाने में लगे है .अब इन में फेस पर ग्लो यानि चमकदार चेहरा भी जुड गया है.                     इन उत्पादों में हल्दी और केसर जैसे प्राकृतिक संसाधनों  के इस्तेमाल ने इनके प्रति लगाव बढ़ा दिया है क्योंकि यह तत्त्व प्राचीनकाल से ही रंगत बढ़ाने में मददगार रहे है.बहरहाल किसी की किस्मत का फैसला उसकी त्वचा के रंग के आधार पर होना जहाँ तक सही है? जिसका रंग सांवला है वो अच्छी नौकरी की हकदार नहीं है,यह कहाँ तक तर्कसंगत है. हम कुछ विज्ञापनों में देख रहे है कि फेयरनेस क्रीम लगाने के बाद ही दोस्त बनते है. हमारे देश में जाति-वर्ण भेद तो पहले से ही हैं अब रंगभेद को भी जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है.  समाज भले ही प्रगति कर रहा हो लेकिन इन वज़हों से अंतर भी आ रहा है. मैं यह मानती हूँ कि गोरे रंग का महत्त्व जितना है उतना ही महत्त्व सांवले रंग को दिया जाना चाहिए.हम क्यों सांवले रंग को अपमान या शर्मिंदगी से जोड़ कर देखते है हमें व्यक्ति का आंकलन उसकी बाहरी सुंदरता की बजाये आंतरिक सुंदरता और व्यक्तित्व की खूबियों से करना चाहिए.वैसे भी बाहरी सुंदरता को तो क्रीमों से बढ़ा सकते है पर  आंतरिक सुंदरता तो हर व्यक्ति को अपने परिश्रम से हासिल होती है इसलिए हमें गोरे या सांवले को आंकलन का तरीका न बनाकर पूर्ण रूप से पूरे व्यक्तित्व के आंकलन को सर्वोपरि मानना चाहिए.                                                                आज समाज को अपनी सोच को बदलने का समय है अगर हम गौर करें तो जो आकर्षण गोरे रंग में है उससे ज्यादा गरिमा सांवले रंग में होती है. इसे हम केवल दबी-कुचली जातियों  का रंग न मान कर एक मूल्यवान पारम्परिक विशिष्टता मानना चाहिए.हम सभी जानते हैं कि हमारे इष्ट देवों में अधिकतर सांवले रंग के देवता है जो हमारे लिए प्रेरणास्रोत है इसलिए सांवले रंग का होना भी उतना ही जरुरी है. जिस तरह जल और हवा हमारे जीवन के आवश्यक तत्व है.हर सिक्के के दो पहलु होते हैं और वैसे भी पार्वती जी को ताम्बई रंग का माना जाता है,सीताजी का जन्म प्रथ्वी से हुआ तो उनका रंग तो धरती जैसा ही था ,इस सत्यता को लोग भुला बैठे है और भेडचाल की तरह सफ़ेदी के पीछे भाग रहे हैं.आज जिन्हें खूबसूरत कहा जाता है वो फायदे उठाते है.जिन्हें नहीं कहा जाता वे हीन भावना से ग्रस्त हो जाते है.मेरा मानना है कि गोरी या काली त्वचा से कुछ नहीं होता.त्वचा चमकदार और हेल्दी होने पर कोई भी खूबसूरत दिख सकता है.इसके अलावा फेयरनेस प्रोडक्ट को अपनाने से पहले यह भी पता कर ले कि वे नुकसानदेह तो नहीं हैं क्योंकि कुछ प्रोडक्ट मेलानिन पिगमेंट के सिंथोसिस को ब्लाक कर देते है.हायड्रोकीनोन का लगातार प्रयोग हाइपो पिगमेंटेशन के अलावा त्वचा कैंसर का कारण भी बन सकता है. यह भी याद रखना चाहिए कि एक ही प्रोडक्ट हर त्वचा को सूट नहीं कर सकता.इस लिए हमें अपने रंगरूप से ज्यादा अपनी सोच,विचार,आदत,भावनाओं,ज्ञानवर्धन अपनापन,प्यार, आदर सम्मान को महत्व देना चाहिए क्योंकि यह रंगरूप तो चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात इस कहावत को पूरा करता है जब तक यह है तब तक सब हमारे लिए सब अनुकूल है पर बाद में प्रतिकूल भी हो सकता है.इसलिए खुद पर आत्मविश्वास, आत्मनियंत्रण,आत्मआंकलन आत्मसम्मान के साथ अपने जीवन को प्रगति के पथ पर अग्रसर करना चाहिए क्या पता ईश्वर ने हमारे लिए कौन से अदभुत संसार को रचा रखा हो और गोरे होने के चक्कर में आप उससे वंचित रह जाये इस लिए खुद को अपने उसी संसार को पाने की ओर आगे बढ़ाये जो ईश्वर  ने रचा है....!                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       

Saturday, August 27, 2011

केवल कमाई नहीं सामाजिक सरोकारों की भी चिंता करे मीडिया

आज हमारे पत्रकारों ने मीडिया की तस्वीर बदल दी है.आज एक टीवी एंकर धारावाहिक के मुकाबले ज्यादा धयान आकर्षित कर रहा  है. ब्रेकिंग न्यूज़ का अर्थ बदल कर किसी की इज्ज़त उतर देना रह गया है.आज मीडिया की जिम्मेदारी भी सवालों के घेरे में है.मीडिया केवल वही समाचारों को प्रदर्शित करता है जो उसे टीआरपी रेटिंग में टॉप पर पहुंचा दे जबकि असलियत में मीडिया को केवल उन्ही समाचारों को प्रकाशित-प्रसारित करना चाहिए जो सभी के लिए उपयोगी और तर्कसंगत हो.हमें इस ओर भी धयान देना चाहिए कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी जिम्मेदारी 'जवाबदेही' के साथ  निभाए लेकिन आज हमारे पास भी  इतना वक्त ही नहीं कि हम अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा कर सके.मीडिया ने इस संसार  को एक छोटा द्वीप बना दिया है इसका यह अर्थ है कि मीडिया जानकारी देने में सफल तो है पर शायद इसमें  कुछ क्षेत्रों की  जानकारी का अभाव है जो बाकी से ज्यादा महत्वपूर्ण है जैसे गांव में अभी भी आधारभूत सुविधाएँ नहीं है इन जानकारियों को क्यों हम महत्त्व नहीं देते.मीडिया किसी क्रिकेटर की  शादी को मुख्य समाचारों में जगह देगा लेकिन किसी किसान या बुनकर से जुड़े समाचार को वो तवज्जो नहीं  मिलेगी. अगर किसी नेता के चुनाव के प्रचार से जुडी खबर होगी तो उसके लिए मीडियाकर्मी सारे काम को दरकिनार करके उनके क्षेत्र का पूरा लेखा जोखा लेकर  उसपर एक कार्यक्रम तैयार करके विशेष के तौर पर पेश करते है                                                                                                                          .                                                                          हम सभी को मीडिया के नए स्वरुप पर आश्चर्य तो अवश्य होता  है पर देश के नागरिक होने के नाते मीडिया द्वारा दी जा रही ख़बरों के प्रति अपने विचारों से  सभी को अवगत कराने में हम लापरवाह हैं.आज मीडिया में बलात्कार, क़त्ल, हत्या,लूट मारपीट की ख़बरें ज्यादा आती है. मीडिया रक्षक से ज्यादा भक्षक बनने की ओर अग्रसर है.दरअसल मीडिया एक पैड सर्विस बनता जा रहा है.अगर कोई खबर मीडिया में आने से रोकनी हो तो उस के लिए कुछ जेब ढीली कीजिये और आपका काम हो गया जैसे बहुत  सारे उदाहरण है जैसे  अमर सिंह का स्टिंग ऑपरेशन,अनेक आईएएस अधिकारियों के घरों पर आयकर विभाग के छापों की खबर हो, चाहे नीरज ग्रोवर हत्याकांड हो, आरुषि हत्याकांड हो,चाहे आदर्श घोटाला हो,चारा घोटाला हो,२जी स्पेक्ट्रम घोटाला हो,सीडब्लूजी घोटाला हो सभी में  मीडिया ने अपनी छवि को और धूमिल किया है और वह सच्चाई को सामने लाने में असफल रहा है. आज मीडिया  प्रभावशाली  लोगों की हाथों की कठपुतली की तरह हो गया है.वो नेताओं के बेटे और बेटियों के विवाह का बड़े स्तर  पर कवरेज करता है.फ़िल्मी सितारों की पर्सनल जानकारियां भी अपने समाचारों में शामिल करता है. जैसे ऐश्वर्या राय को बेटी होगी या बेटा- मीडिया के लिए यह टॉप मोस्ट खबर है वे यह नहीं सोचते की इस खबर से ज्यादा महत्वपूर्ण खबर जनसामान्य से जुडी कोई बात हो सकती है.अगर कोई नेता गिरफ्तार हो जाता है तो मीडिया उसके सोने जागने से जुडी सारी बातें ब्रेकिंग न्यूज़ में शामिल करता है जिनकी वास्तव में कोई जरुरत नहीं है.आज मीडिया में अनेक वार्ता या विचार विमर्श से जुड़े कार्यक्रम आते है जिनमे कुछ विशेष मेहमानों को ही  शामिल किया जाता है .ज्यादातर उन मेहमानों पर चीखता चिल्लाता एंकर कभी भी खोजी पत्रकारिता का विकल्प नहीं बन सकता. टीवी चैनल की रिपोर्टिंग टीम अख़बारों के मुकाबले छोटी होती है.ज्यादातर खबरिया चैनल घाटे में डूबे है.पेचीदा मामलों पर उनके पास विशेषज्ञ नहीं है.अगर मीडिया के तेवर  चढ़े हो  तो नेताओं की हालत पतली हो जाती है.जैसा की आजकल हो रहा है. मीडिया द्वारा अन्ना हजारे के अनशन को महत्व देने से सरकार को अपनी स्थिति बार-बार अच्छी बनाने की कोशिश करनी पड़ रही है.इस घटना से सबक लेते हुए  मीडिया को वास्तविक तौर पर अपनी जिम्मेदारी को  समझना होगा और उसे जन कल्याण से जुड़े उद्देश्यों के प्रति समर्पित रहना होगा वरना टीआरपी और कमाई की अंधी दौड़ उसे आम जनता के बीच कहीं का नहीं छोडेगी.दुनिया के सबसे बड़े मीडिया मुग़ल रूपर्ट मर्डोक का उदाहरण हमारे सामने है.                                                                                                          

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