गुरुवार, 18 अगस्त 2011

अन्ना ही क्यों आहुति तो हम सभी को देनी चाहिए

कुछ ही दिन बाद हम अपने देश के स्वाधीनता की ६६वी सालगिरह मनाने वाले है.क्या हम वाकई इस अवसर को मनाने के हकदार हैं?.यदि हाँ तो क्यों नहीं हमें सभी तरह की स्वतंत्रता प्राप्त है. हमें केवल कागजी तौर पर ही आज़ादी प्राप्त  है.हमें  अपने विचारों को व्यक्त करने से भी रोका जाता है. उन्हें दबाने के लिए साम,  दाम, दंड, भेद सभी उपायों को अपनाया जाता है. आम आदमी तो दूर हमारे प्रतिनिधियों तक को बख्शा नहीं जाता जैसा कि हमें जेपी से लेकर अन्ना हजारे तक कई बार देखने को मिल चुका है. ज्यादा पुरानी बात नही उसी तरह के उद्देश्य को लेकर अन्ना हजारे और उनकी टीम ने  एक बार फिर२५ जुलाई को भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए जन लोकपाल बिल को उसके उचित स्वरुप में लागू करवाने के लिए अनशन की घोषणा की है.
    .                                       हमारे लिए सोचने की बात यह है कि क्या इस देश का नागरिक होने के बाद भी अपने विचारों को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता नहीं.खैर अन्ना की इस  क्रांति का परिणाम जो भी हो इतना ज़रूर है कि दूसरी आज़ादी की लड़ाई के लिए एक बार फिर महात्मा गाँधी का प्रतिरूप हमारे साथ है जिसका लड़ने का तरीका भी अहिंसावादी है विचार/व्यवहार सभी गांधीवादी है तो फिर क्यों नहीं हम सभी भारतीयों को इस महात्मा की नई अगस्त क्रांति में अपने समर्थन की आहूति  देनी चाहिए.जन आंदोलनों तथा संसदीय प्रक्रियाओं के बीच एक सहयोग और टकराव के द्वन्द से लोकतंत्र और मज़बूत होगा.आपातकाल को याद रखना  भी ज़रुरी है.क्योंकि वो हमारे इतिहास का कटु अध्याय है इसलिए किसी भी सत्ता को आन्दोलनों का मुकाबला प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनैतिक तरीके से करना चाहिए .अगर हम अपनी बात कहने के लिए शांतिपूर्ण तरीका अपनाते है तो वो लोकतंत्र को मजबूत करता है.हम पहले हुए आंदोलनों को देखें तो जेपी आन्दोलन के दूरगामी परिणामों ने लोकतंत्र को और परिपक्व बनाया.इस आन्दोलन में भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा था ,इस तरह के आंदोलनों से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को खुद की कमी दूर करने का अवसर मिलता है.अन्ना ने सरकार को अपनी ही रणनीतियों पर बार बार विचार को मजबूर भी किया.अन्ना का चाहिए है कि सरकार को अन्ना के आन्दोलन को मिस्र या अन्य अरब देशों में बने बगावती हालात बनने के पहले शांत करवाना चाहिए. कहीं ऐसा न हो कि हुस्नी मुबारक जैसी स्थिति हमारे नेताओं की हो जाये. वैसे विश्वास में कमी,मानवीय मूल्यों में कमी,अपनेपन की कमी जैसी कमियों की भावना भ्रष्टाचार को जन्म देती है.स्वार्थ असुरक्षा की भावना भी एक अन्य कारण है.आज हमारा देश जनसँख्या में विश्व का छटवा देश है.भारत के नागरिकों को अपनी संस्कृति और आध्यात्मिकता पर गर्व होना चाहिए.प्रगति और खुशहाली का सही अर्थ हर ओर खुशी होता है.हम सभी को इस के लिए एक मजबूत और भ्रष्टाचार मुक्त,प्रगतिशील राष्ट्र बनाने में संलग्न हो जाना चाहिए.और प्रण करना चाहिए की न खुद भ्रष्ट बनेगे और ना ही देश को भ्रष्टाचार की गर्त में जाने देंगे चाहे इसके लिए एक जुट होकर संघर्ष क्यों ना करना पड़े.क्यों ना हमें अपना सर्वस्व न्योछावर करना पड़े हम इसे अपना कर्तव्य समझकर सदैव इस के लिए प्रयासरत रहेंगे..... !यह देखना दिलचस्प होगा की सरकार इस बार क्या कदम उठती है. इस आन्दोलन के बाद जिस से देश सच्चे अर्थों में भ्रष्टाचार मुक्त और प्रगतिशील बने ...........

सोमवार, 8 अगस्त 2011

बीमार होना है तो जमकर करो मोबाइल पर बात

आज के समय में मोबाइल हर युवा दिल की धडकन बन चुका है. तो दूसरी ओर प्रतिष्ठा का प्रतीक  भी है. आज करोड़ो   मोबाइल उपभोक्ता है.मोबाइल उनके जीवन शैली के साथ उनका सबसे विश्वसनीय मित्र साबित हो रहा है.वे हर वक्त इसके बिना अपने को अधूरा महसूस करते है.लेकिन अगर बात स्वास्थ्य से जुडी हो, तो विचार करने की ज़रूरत है.भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया सिमटकर गाँव बन गयी है.इससे नयी तकनीक का तेज प्रसार होता है.जिस तरह मोबाइल का प्रसार हुआ,  उसमे समय पर चेतावनी मिलने की सम्भावना कम होती है.मोबाइल के प्रसार को प्रगति के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया गया.जब किसी उत्पाद के साथ आर्थिक हित जुड़े हो तो उनके खतरों को छिपाने का प्रयास ज्यादा होता है.यह भी निश्चित है कि लोगों को मोबाइल से अनेक लाभ नज़र आये.भारत सहित पूरी दुनिया में २४ घंटे संपर्क को बनाये रखने में ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्युनिकेशन सेवा(जीएसएम) प्रारंभ की गयी.जीएसएम ने पूरे भारत में दूर संचार क्रांति को पहुँचाने में मदद की.. मोबाइल के लंबे इस्तेमाल से १५% लोग मानसिक परेशानियों से जूझ रहे है.                                                       
भारत सरकार के संचार-सूचना तकनीक मंत्रालय ने मोबाइल से जुड़े खतरों के अध्यन के लिए एक अंतर मंत्रालय समिति का गठन किया है. जिसने अपनी रिपोर्ट में मोबाइल फोन और इनके टावर से निकलने वाले रेडियेशन से याददाशत कमजोर होना,पाचनतंत्र में गडबडी होना,अनिद्रा,थकान,सिरदर्द आदि खतरे जुड़े है.इससे ब्रेन केन्सर भी हो सकता है.बाद   में  थायरोइड केन्सर की सम्भावना है.ह्रदय की धमनियां खराब होने से अचानक मौत हो सकती है.श्वेत रक्त कणिकाओं में कमी से रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है.प्रजनन अंग क्षतिग्रस्त हो जाते है जिससे अस्थायी नपुंसकता आ जाती है.आज के युवा हर दिन अपनी रिंग टोने बदल देते है.इन टोन की मस्त धुन सुनते युवा अपने दिल को कमजोर बना रहेहै.आज मोबाइल की बैटरी फटने के भी कई उदाहरण हमारे सामने है.                                                                         
 इन खतरों को कम करने के लिए कुछ सावधानियां बरती जा सकती है.जब तक संभव हो लैंडलाइन फोन का इस्तेमाल करे,..लंबी बात मोबाइल पर न करें,कमजोर सिग्नल की स्थिति में मोबाइल के उपयोग से बचे,फोन को पास रखकर न सोये,इसे सिर और तकिये से दूर रखे,रात में इसे स्विच ऑफ कर देना चाहिए,बच्चोंको मोबाइल से दूर रखना बेहद ज़रुरी है. उपभोक्ता बेहतर गुणवत्ता वाला मोबाइल फोन खरीदकर अपने खतरे को कम कर सकते है. हैण्ड सेट को पहनकर बात करने की आदत डाले.मोबाइल खरीदते समय ध्यान रखें कि उसमे निम्न स्तर का एसएआर  हो.जो आपकी
शरीर पर रेडियो तरंगों का प्रभाव मापता है.संवाद के लिए जहाँ तक सम्भव हो एसएमएस का इस्तेमाल करें. जिस से हम अपनी इस आधुनिकतम खोज को वरदान के रूप में
अपना सकें और अपने देश कि प्रगति को नए आयामों कि ओर ले जा सकें..........!                                  

सोमवार, 20 जून 2011

नारी अब तुम केवल 'विज्ञापन' हो

                                          आज हम विकसित समाज में रह रहें है.जहाँ हम अपनी परम्परा और आदर्शों को लेकर आगे बढ़ रहे है.आज हम अपनी जीवन  शैली को आज के अनुरूप ढालने का प्रयास कर रहे है.पर क्या इस प्रयास में हम अपनी पहचान तो नहीं खो रहे है. हम तो अपने बड़ों की बताई बातों  को सम्मान देते है.उनके अनुसार आगे बढते है, समाज में नारी का ओहदा सबसे ऊँचा मानते है. आज की नारी पुरुषप्रधान समाज में पुरुषों के कंधे  से कंधा मिलाकर हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है.लेकिन इस भाग दौड में हम कहीं कुछ पीछे छोड़ते जा रहे है क्या हम कभी उस पर गौर करेंगे ?                                                           
           ऐसा क्या है जो प्रगति के मायने बदल रहा है?प्रगति से तो देश, समाज, की बदलती तस्वीर सामने आती है.आमतौर पर हम अपने आसपास के माहौल से प्रभावित होते है.और अपनी सफलता के लिए सभी के सहयोग को सर्वोपरि मानते है.आज के समय में प्रतियोगिता का समय है.जहाँ हर कोई दूसरे से आगे निकलने के लिए हर तरह के प्रयास करता है.इस माहौल में विज्ञापनों का बोलबाला है.जो हमें वर्तमान की एक नयी परिभाषा समझाते है, आज विज्ञापन उत्पाद के अनुसार नहीं होते, इनमे श्रेष्ठता की जंग  ही दिखाई  देती है जिसमे केवल आगे निकलने की धुन सवार है. .विज्ञापन में सादगी का स्वरुप कहीं खोता जा रहा है.विज्ञापन पश्चिमी सभ्यता के अनुसरण करनेवाले ज्यादा लगने लगे है.क्योंकि कहीं न कही इनमे औरत को एक अश्लीलता प्रदर्शन का जरिया बनाया जा रहा है. आज आप टेलिविज़न के किसी भी विज्ञापनों को देखें तो पता चलता है कि उनमें प्रचार से ज्यादा अश्लीलता ने अपना स्थान पा लिया है जिस पर किसी को भी एतराज़ नहीं न ही कोई शिकायत है.आप किसी भी उत्पाद का विज्ञापन लेले चाहे फिर वो नेपकिन का विज्ञापन हो,परफ्यूम का हो, साबुन का हो, क्रीम का,शैम्पू का,कोल्ड ड्रिंक का, सूटिंग-शर्टिंग का, कॉस्मेटिक्स के विज्ञापन हो सभी नारी की अस्मिता पर सवाल उठाते नज़र आ रहे है.क्या हम इस तरह की बेइजती इसी तरह  होते रहने देंगे या इस लिए कदम उठाएंगे क्योंकि इन विज्ञापनों में नारी के स्वरुप को देखकर कम से कम इस बात पर यकीं नहीं होता कि हमारे देश में नारी को देवी का दर्ज़ा प्राप्त है,  देवी को तो हम कम से कम इस तरह के स्वरुप में नहीं पूजते? क्या हम अपने मूल्यों और आदर्शों के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे? क्या हम अपनी बहिन,बेटियों को वो समाज, वो माहौल दे रहे है जो उन्हें मिलना चाहिए?दरअसल समाज में बढ़ रही अराजकता के पीछे भी कहीं न कहीं हमारी बदली सोच ही जिम्मेदार है.आज नारी को समाज में सम्मान तो मिल रहा है  पर कहीं न कहीं अभी भी पूर्ण सम्मान की इबारत लिखी जाना बाकी है,.क्या अगर विज्ञापनों में नारी का अश्लील स्वरुप नहीं होगा तो कंपनियों को उस की सही कीमत नहीं मिलेगी? मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ.अगर सही विचार और सही सोच के साथ सही मार्गदर्शन हो तो इस तरह के विज्ञापनों को बदलकर परम्परा और संस्कृति से जुड़े मूल्यों को ध्यान में रख कर विज्ञापन बन सकते है और कम्पनियाँ लाभ  प्राप्ति के सारे रिकॉर्ड तोड़ सकती  है तो क्यों नहीं इस और सार्थक प्रयास की शुरुआत हम करें और नारी की धूमिल होती तस्वीर में आशा और विश्वास के नए रंग भरें...............                                                                                                                    

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