बुधवार, 15 जुलाई 2026

क्या रिश्ते अब केवल उपयोगिता से तय होने लगे हैं?





हम सभी के जीवन में अनगिनत लोग आते हैं। कुछ जन्म से हमारे अपने होते हैं, कुछ परिस्थितियाँ हमें उनसे जोड़ देती हैं और कुछ ऐसे भी मिल जाते हैं जिनका कोई औपचारिक रिश्ता नहीं होता, फिर भी वे रिश्तेदारों से कहीं अधिक अपने लगने लगते हैं। यही लोग हमारे जीवन की कहानी को आकार देते हैं।

परिवार हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। सुख हो या दुख, सफलता हो या संघर्ष, हम सबसे पहले अपने परिवार और रिश्तेदारों को ही याद करते हैं। वर्षों तक यही भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत भी रही है कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि साथ निभाने से मजबूत होते थे।

लेकिन समय बदल रहा है और उसके साथ रिश्तों की परिभाषा भी।आज अक्सर ऐसा महसूस होता है कि कई रिश्ते भावनाओं से कम और उपयोगिता से अधिक संचालित होने लगे हैं। बहुत दिनों बाद किसी रिश्तेदार का फोन आए तो अनायास मन में यह सवाल भी उठ जाता है कि कहीं कोई काम तो नहीं होगा। यदि आप उनकी अपेक्षा के अनुरूप सहयोग कर दें तो रिश्तों में आत्मीयता बनी रहती है, लेकिन किसी कारणवश "ना" कह दें या मदद करने में असमर्थ हों, तो वही रिश्ता अचानक ठंडा पड़ जाता है। ऐसा लगता है जैसे वर्षों की निकटता कुछ ही क्षणों में अप्रासंगिक हो गई हो।

यह अनुभव केवल मेरा नहीं है। बदलती सामाजिक जीवनशैली, व्यस्त दिनचर्या और बढ़ती व्यावहारिकता ने रिश्तों को भी प्रभावित किया है। आज कई बार व्यक्ति को उसके स्वभाव, स्नेह या संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता से आँका जाने लगा है। रिश्तों का मूल्य इस बात से तय होने लगा है कि आप किस समय किसके कितने काम आ सकते हैं।

एक समय था जब रिश्ते हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी माने जाते थे। यह ऐसी पूँजी थी जो कठिन समय में हिम्मत देती थी, खुशियों को कई गुना बढ़ा देती थी और जीवन में अपनापन बनाए रखती थी। लेकिन धीरे-धीरे इस पूँजी में भी स्वार्थ की दरारें दिखाई देने लगी हैं। अब कई बार ऐसा लगता है कि रिश्तों को बनाए रखने के लिए हर बात पर "हाँ" कहना ही सबसे बड़ा गुण बन गया है।

लेकिन क्या हर बार "हाँ" कहना संभव है? क्या परिस्थितियाँ, सीमाएँ और व्यक्तिगत विवशताएँ कोई मायने नहीं रखतीं? और सबसे बड़ा प्रश्न—क्या किसी रिश्ते में "ना" कहना अपराध है?

मेरा मानना है कि किसी भी स्वस्थ रिश्ते की असली परीक्षा केवल "हाँ" सुनने में नहीं, बल्कि सम्मानपूर्वक कही गई "ना" को स्वीकार करने में भी होती है। यदि कोई रिश्ता एक असहमति या एक असमर्थता से टूट जाता है, तो शायद वह पहले से ही बहुत कमजोर आधार पर खड़ा था।

रिश्तों की खूबसूरती तभी बनी रह सकती है जब उनमें अपेक्षाओं से अधिक विश्वास, स्वार्थ से अधिक संवेदनशीलता और सुविधा से अधिक अपनापन हो। क्योंकि अंततः रिश्ते उपयोगिता से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, समझ और साथ निभाने की भावना से जीवित रहते हैं।

आप क्या सोचते हैं? क्या आज के दौर में रिश्ते पहले की तुलना में अधिक व्यावहारिक हो गए हैं, या अभी भी ऐसे रिश्ते मौजूद हैं जो हर परिस्थिति में बिना किसी अपेक्षा के साथ खड़े रहते हैं? अपनी राय अवश्य साझा करें।

सोमवार, 6 जुलाई 2026

समय जैसे पंख लगाकर उड़ गया

 

एक दिन, एक सप्ताह, या एक महीना नहीं पूरा एक साल यानि 365 दिन..हो गए और पता ही नहीं चला। ये सिर्फ एक गणना नहीं है  बल्कि बीता हुआ वक्त है। मेरे लिए तो यह अद्भुत पल हैं। 

वो पल जो हमने देवभूमि हिमाचल प्रदेश की राजधानी एवं क्वीन ऑफ हिल्स के नाम से मशहूर शिमला में व्यतीत किए। आपको याद ही होगा कि आकाशवाणी भोपाल से तबादले के बाद 30 जून 2025 को संजीव ने शिमला में प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो का दायित्व संभाला था। हाल ही में 30 जून 2026 को हमने शानदार एक साल पूरा कर लिया। 

हालांकि, एक वर्ष पूर्ण होने पर कुछ अचंभा भी हुआ । अचंभा इसलिए क्योंकि यहां आने से लेकर आज तक यहां का खुशनुमा मौसम, खिलखिलाते चेहरे और हमारे मित्रवत लोगों ने हमें कभी भी ये एहसास नहीं होने दिया कि हम किसी अनजान और पहाड़ी प्रदेश में है। यहां के अपनेपन में इतने जल्दी समय पंख लगा कर उड़ गया..पता ही नहीं चला।

 वैसे, इसका श्रेय संजीव के सहकर्मियों को भी जाता है। ईश्वर से प्रार्थना है कि शिमला में जब तक हम रहें देव कृपा इसी तरह बनी रहे और वक्त इसी तरह पहाड़ी मिठास और अनूठे अहसास के साथ बीते।

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